


Election Commission: निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश में राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज है। विवाद की शुरुआत एक रिपोर्ट से हुई, जिसमें दावा किया गया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की गईं। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची, SIR, फॉर्म-6, चुनावी डेटा और डिजिटल सिस्टम से जुड़े फैसलों से बताया गया।
हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों की उस व्याख्या से असहमति जताई है जिसमें इसे आयोग के भीतर गंभीर मतभेद या संस्थागत संकट के रूप में पेश किया गया। आयोग के अनुसार अलग-अलग विचार किसी भी संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय आयोग की सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। आयोग ने विशेष रूप से कहा है कि SIR से जुड़े सभी फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद
द इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों को लेकर रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटा और डिजिटल सिस्टम से संबंधित प्रक्रियाओं सहित कई मुद्दों का उल्लेख किया गया।
रिपोर्ट सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने कहा कि आंतरिक स्तर पर अलग-अलग राय होना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम फैसले आयोग के स्तर पर लिए गए और SIR सहित प्रमुख निर्णयों को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई।
इस बीच यह तथ्य भी सामने आया कि कथित मतभेदों के बावजूद तीनों चुनाव आयुक्त कई महत्वपूर्ण चुनावी ब्रीफिंग में संयुक्त रूप से नजर आए। इंडिया टुडे के अनुसार अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आयोग ने कई संयुक्त ब्रीफिंग कीं।
SIR को लेकर क्यों मचा विवाद?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) मतदाता सूची के सत्यापन और पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम प्रारंभिक मतदाता सूचियों से बाहर हुए जिनका सत्यापन विभिन्न कारणों से नहीं हो सका।
रिपोर्टों के अनुसार, करीब 13 करोड़ नाम प्रारंभिक सूचियों से बाहर हुए, जिसके बाद विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठाए।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को सही और विश्वसनीय बनाए रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। अदालत ने कहा था कि इस तरह की प्रक्रिया का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए सटीक एवं विश्वसनीय मतदाता सूची सुनिश्चित करना है। हालांकि, अदालत ने प्रक्रिया से जुड़े कुछ पहलुओं पर संबंधित प्राधिकरणों द्वारा आगे की कार्रवाई और सत्यापन की आवश्यकता भी बताई थी।
फॉर्म-6 और डिजिटल सिस्टम पर भी उठे सवाल
विवाद का एक प्रमुख हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 और चुनावी डेटा से जुड़े डिजिटल सिस्टम को लेकर है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में किए गए कुछ बदलावों और डिजिटल सिस्टम से संबंधित प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में कुछ बदलावों को लेकर ‘अनधिकृत’ और ‘कानूनी’ प्रक्रिया से जुड़े सवालों का भी उल्लेख किया गया।
वहीं, आयोग ने अपने जवाब में कहा कि निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न विचार सामने आना असामान्य नहीं है और अंतिम निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि ECINet में अधिकारियों की भूमिका-आधारित शक्तियां बरकरार हैं।
मतदाता सूची की पारदर्शिता पर बहस
SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस हुई है। विपक्षी दलों ने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का सत्यापन और उसमें मृत, डुप्लीकेट अथवा अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना चुनावी प्रक्रिया की शुचिता से जुड़ा विषय है।
नाम छूट जाने की शिकायतों के बाद आयोग ने कुछ जगहों पर प्रक्रिया को आसान बनाने के कदम भी बताए हैं। हालिया जानकारी के मुताबिक, बूथ लेवल अधिकारी यानी BLO ऐसे मतदाताओं से संपर्क कर दस्तावेज जुटाने और प्रक्रिया में मदद करने के लिए घर-घर जा सकते हैं। आयोग ने ECINet प्रणाली की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों वाली समिति बनाए जाने की भी जानकारी दी है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर पुरानी बहस
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और सरकार से उसकी दूरी को लेकर भारत में बहस नई नहीं है। इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं जब आयोग की शक्तियों और सरकार के साथ उसके संबंधों को लेकर विवाद सामने आए।
1989 में तत्कालीन सरकार द्वारा चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाए जाने और बाद में 1990 में इसे फिर एक सदस्यीय किए जाने का घटनाक्रम इसका एक उदाहरण है। 1993 में आयोग को फिर तीन सदस्यीय बनाया गया। इसके बाद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और अन्य चुनाव आयुक्तों के अधिकारों को लेकर भी विवाद हुआ।
1995 में सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच अधिकारों से संबंधित स्थिति स्पष्ट की। बाद के वर्षों में भी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और आयोग की स्वतंत्रता को लेकर राजनीतिक बहस जारी रही।
हालांकि, इन ऐतिहासिक घटनाओं को वर्तमान विवाद के साथ सीधे जोड़ने से पहले अलग-अलग परिस्थितियों और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
नियुक्ति प्रक्रिया भी बनी बहस का हिस्सा
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर 2023 में संसद ने नया कानून बनाया। इसके तहत चयन प्रक्रिया के लिए एक समिति का प्रावधान किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।
इसी व्यापक बहस के बीच भारत को 2026 के लिए International IDEA की Council of Member States की अध्यक्षता मिली। दिसंबर 2025 में भारत ने यह अध्यक्षता संभाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भारत की ओर से अध्यक्ष की भूमिका मिली। International IDEA ने भी भारत के 2026 Chairship संभालने की पुष्टि की है।
मतभेद या संस्थागत संकट?
मौजूदा विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को किस तरह समझा जाए।
एक पक्ष इसे निर्णय प्रक्रिया में गंभीर असहमति और पारदर्शिता से जुड़े सवालों के रूप में देख रहा है। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का कहना है कि संस्थागत विमर्श में अलग-अलग राय आना स्वाभाविक है और अंतिम निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए हैं।
इस विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में भी मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली और SIR से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। याचिका में आयोग की निर्णय प्रक्रिया और SIR की वैधता से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
इसलिए फिलहाल पूरे मामले को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर समझने के बजाय तीन स्तरों पर देखना महत्वपूर्ण है आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां, आयोग की आधिकारिक सफाई और न्यायिक समीक्षा।
निर्वाचन प्रक्रिया में जनता का विश्वास किसी भी लोकतंत्र की महत्वपूर्ण नींव है। ऐसे में आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के सत्यापन और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवालों का तथ्यात्मक एवं पारदर्शी स्पष्टीकरण सार्वजनिक विश्वास के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
लेखक: के. विश्वदेव राव
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Rajesh SharmaEditor-in-Chief
Chief Editor and Administrator at Live Today India with over 15 years of media leadership experience.
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